Hindi Poem: Jal Raha Gareeb Hai!

जल  रहा  गरीब  है

दृश्य  ये  अजीब  है

जल  रहा  गरीब  है

लपट यह  मेहेंगाई  की

सभी  को  कर  रही  हालाक  है

दो  जून  की  रोटी  भी  अब  तो  यहाँ  दुश्वार  है

देख  बेपरवाही  हमारी  सरकार की

कितना  बड़ा  ये  मज़ाक  है

कहाँ  है  वो  आर्थिक  दर

जिस  पर  सब  को  नाज़  है

चमक  रहा  है  भारत

सबका  यह  विचार  है

दो  जून  की  रोटी  भी  अब  तो  यहाँ  दुश्वार  है

देख  बेपरवाही  हमारी  सरकार  की

कितना  बड़ा  ये  मज़ाक  है

नहीं  दूर  हुई  गरीबी  तो

सरकार  की  ये  दरकार  है

३२  रुपैये  गरीब  की

एक  नयी  पहचान  है

देख  बेपरवाही  हमारी  सरकार  की

कितना  बड़ा  ये  मज़ाक  है

दृश्य  ये  अजीब  है

जल  रहा  गरीब  है

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0 thoughts on “Hindi Poem: Jal Raha Gareeb Hai!

  1. Rishabh Srivastava

    Sahi baat hai… aaj ke daur mein aadhi janta bhookh se behaal hai aur hamare anaaj godamo mein sad jaate hain… sakari daawe development index or economy growth ke khokle hain…. somehwhere priorities have gone wrong….

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