Hindi Poem: Khud Ko haara mehsoos karta hoon!

न जाने क्यूँ ऐसा प्रतीत होता है
जीवन एक दौड़ के सिवा कुछ भी नहीं है
हर व्यक्ति एक धावक है
वो जीतने के लिए कुछ भी कर सकता है
ये दौड़ है – औरों से आगे निकलने की
पर इस दौड़ को कोई अंत नहीं है
शायद इसी लिए आज हमारे मुख पर कृत्रिम मुस्कान है
आस-पास सब कुछ अनैसर्गिक है
स्वार्थपरता इतनी बढ़ गयी है
की अपने आगे हम किसी को देख ही नहीं पाते
खुद की सम्पन्नता से ज्यादा हमें औरों की असफलता की ख़ुशी है
किसी और का दर्द, दुःख, मजबूरी हमें सताता नहीं है
गैरों की बात क्या, इस दौड़ में अपने पीछे छूट रहे हैं
और हम अंधों की तरह माला के मोती तोड़ते जा रहे हैं
अनुराग और अदब भूल गए हैं
रिश्ते नाते सफलता की सीढ़ी के लिए कुर्बान कर रहे हैं
पैसे कमाने की भूख ने हमें भावशून्य कर दिया है
ये सामाजिक पतन का सूचक है
नैतिकता अब हमारे यहाँ घर करती नहीं
यथार्थ जीवन में स्नेह एवं भावना खो गयी है
एहिक जीवन की चाह में हम तन्हा रह गए हैं
समय के अभाव में सारे बंधन कमज़ोर पड़ रहे हैं
इतना खोने की बाद भी हमें कहाँ जाना है इसका इल्म नहीं है
पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो सोचता हूँ
इतना पाने के बाद भी जीवन नीरस है
इस आप-धापी में कागज़ के टुकड़े तो बहुत जुटाए
तमन्ना थी सच्ची ख़ुशी पाने की पर वो कहीं रूठ गयी
अब तो बस अकेलापन और उदासीनता मन में बसर करती है
भटक गया हूँ सांसारिक सुख को ग्रहण करने की लालसा में
मैं शतरंज की बिसात का वो राजा हूँ जो अपनों को खो चुका है
अपना दायित्व और कर्तव्य न निभा पाने का दर्द
अब शूल की तरह कलेजे को भेदता है
चाह कर भी अब हालात बदल नहीं सकता हूँ
व्यर्थ के लौकिक आनंद में अनासक्त हो गया हूँ
इतना पाने के बावजूद इस दौड़ में खुद को हारा महसूस करता हूँ
खुद को हारा महसूस करता हूँ….. खुद को हारा महसूस करता हूँ…..

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