Hindi Poem: क्यूँ कोख से ऐसा रावण पाया?

ज़माने  के  अंदाज़  बदले
उसके  साथ  समाज  बदले
चाह  था  न  बदले  पुरुषार्थ  के  मायने
पर  समय  के  साथ  वो  भी  बदले
एक  आदमी  के  लिए  वीरता  के  अर्थ  बदले
मजलूम  को  हवस  का  शिकार  बनाया
तेजाब  फेंक  उसकी  ख़ूबसूरती  को  बिगाड़ा
पूरे  शहर  में  नग्न  घुमाया
दहेज़  के  लिए  जिंदा  जलाया
इन  कुकर्मो  ने  नर  जाती  को  कलंकित  किया
गौरव  नहीं  किन्तु  शीश  झुकाया
कायरता  की  पताका  फेहराया
देख  नैतिक  पतन  अपने  तनय  की
हर  जननी  का  दिल  कराहा
क्यूँ  कोख  से  ऐसा  रावण पाया!!
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